पंचायत राजनीति में महिला सशक्तिकरण
यशवंत कुमार
स्त्री और पुरुष
के बीच समानता का सिद्धान्त भारत के संविधान की प्रस्तवाना , मौलिक अधिकारों
और कर्तव्यों तथा नीति-निर्देशक सिद्धांतों में अंतर्निहित है । संविधान न केवल महिलाओं को समान अवसर प्रदान
करता है बल्कि सरकार को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह महिलाओं के पक्ष में
सकारात्मक भेदभाव के लिए कदम उठा सके ।
महिलाओं का
सशक्तिकरण – जिसे संक्षेप में डब्ल्यूई भी कहतें हैं , एक एकीकृत बल का बोध
कराता है । यूरोप में इसकी शुरुआत कोई दो शताब्दी पहले हुई , जब 1792 में
मेरी बोलस्टन क्राफ़्ट की पुस्तक ‘ ए विन्डिक्शन ऑफ द राइट्स ऑफ विमेन ‘ का प्रकाशन हुआ
। इसमे पहली बार मेरी ने फ्रांस क्रांति से प्रभावित होकर ‘स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व
‘ के सिद्धान्त को स्त्री समुदाय पर भी लागू करने की मांग की । उन्होने स्पष्ट
रूप से कहा कि कोई भी समतावादी नहीं हो सकता जब तक कि वह स्त्रियॉं को समान अधिकार
और अवसर देने तथा उनकी हिफाजत करने की हिमायत नहीं करता । इसलिए मेरी बोलस्टन क्राफ़्ट
को स्त्री मुक्ति का आदि सिद्धान्तकार माना जाता है । बाद में स्त्री की इस मुक्ति
की वकालत जॉन स्टुअर्ट मिल ने 1869 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ द सब्जेक्शन ऑफ
विमेन ‘ में की ,जिसे और मजबूत स्वर मिला सिमोन द बोउबार की 1949 में
प्रकाशित पुस्तक ‘द सेकेंड सेक्स ‘ से ।
पिछले कुछ
वर्षों में , महिलाओं के सशक्तिकरण को व्यापक नीतिगत समर्थन मिला है
। परन्तु यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि
हम इन उद्देश्यों और विभिन्न सामाजिक समूहों और क्षेत्रों की महिलाओं की
आवश्यकताओं की प्राप्ति कहाँ तक कर सके हैं ।
बलवंत राय मेहता
समिति की सिफ़ारिशों ने पूरे देश में पंचायती राज संस्थाओं की नीव रखी । 1992 के 73वें संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं
को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया है । इसमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और यह
महिला सशक्तिकरण में अहम भूमिका निभा रहा है ।
पिछले करीब 20
वर्षों से भारत में महिला सशक्तिकरण का नया दौर शुरू हुआ है । यह सशक्तिकरण जमीनी
स्तर पर हुआ है । दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ जहां लोकसभा और विधानसभाओं के लिए
33 प्रतिशत आरक्षण का मसला 15-16 वर्षों से लंबित पड़ा है ,दूसरी तरफ पंचायतों में
महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने से जमीनी स्तर पर काफी बदलाव हुए हैं
और एक नयी राजनीतिक संस्कृति भी विकसित हुई है ।
भारत की कुल
जनसंख्या का 48 प्रतिशत महिलाएं हैं । आज भारत में 12 लाख से अधिक महिला निर्वाचित
प्रतिनिधि है जो दुनिया के किसी भी देश में नहीं है । इतना ही नहीं अगर पूरी
दुनिया के निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या जोड़ी जाय तो वह संख्या इन
भारतीय निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों से कम ही है ।
चुनी गयी महिला
प्रतिनिधियों की सार्थक भागीदारी के लिए अकेले आरक्षण ही पर्याप्त नहीं है । महिला
नेताओं के लिए समय और अवसर प्रदान करके इस पहल को बल प्रदान करने की जरूरत है ताकि
वे कर्तव्यों के निर्वहन के साथ-साथ शक्तियों का भी प्रयोग कर सके । इसके अतिरिक्त
उनकी जरूरतों की अभिव्यक्ति के लिए एक मंच की भी जरूरत है । महिला ग्रामसभा , आयोजन तथा
निर्णय लेने की प्रक्रिया मे एक ऐसा ही मंच है ।
पंचायत स्तर पर
जब महिलाओं ने चुनाव प्रक्रिया मे प्रवेश किया , पहले से ही स्वयं
सहायता समूहों की सदस्य रही महिलाएं स्वाभाविक प्रत्याशी के रूप में सामने आयी
क्योंकि स्थानीय समाज में उनकी उपस्थिती पहले से ही थी । यद्पी इसके समर्थन में
कोई डाटा नहीं है लेकिन दक्षिणी राज्यों में राजनीति में महिलाओं का प्रवेश
अपेक्षाकृत अधिक इंद्रियगोचर है जहां पर स्वयं सहायता समूह आंदोलन सुविकसित था ।
लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि महिलाओं कि प्रत्याशिता समुदाय और परिवार जनो
द्वारा भी प्रभावित होती रही है । जो प्रायः अपना प्रभाव बनाए रखने के प्रयास में
सक्रिय महिलाओं को बढ़ावा नहीं देना चाहते हैं ।
पितृसतात्मक
सामाजिक मानक एवं संस्कृति , शिक्षा एवं जागरूकता का अभाव , सीमित आवागमन और वितीय
निर्भरता जैसे कारकों ने पंचायत और ग्रामसभा के कार्यों मे चुनी गयी महिला
प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी मे अवरोध पैदा किया है । उनका कार्य उनके पुरुष
रिश्तेदार – पिता ,पति , श्वसुर अथवा बेटे कर रहे हैं । परिणामस्वरूप पुरुष सभापति
के लिए ‘ सरपंच पति ’ के एक नए नाम के साथ उन्हें पंचायत का कार्य करने के लिए
प्रतिनिधि अथवा अनुपस्थित सदस्य समझा गया । ये महिलाएं स्थानीय स्तर पर शासन के
स्तंभ के रूप के बजाय हैसियत बढ़ाने के स्त्रोत के रूप मे देखी जा रही हैं ।
भारत के संविधान
मे राजनीति मे महिलाओं की महत्वपूर्ण साझेदारी के अवसर का प्रावधान है जो अपने
निर्वाचन क्षेत्र मे लिंग समानता लाने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करके
ग्रामीण क्षेत्रों के ताने बाने पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है । शिक्षा के निम्न
स्तरों , व्यवसायिक अनुभव की कमी तथा निम्न आय के साथ , छनी गयी महिला
प्रतिनिधि तिहरे बोझ तले दाबी है । इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण सुविधा सीमित है , महिला रोल
मौडलों एवं परामर्शदाताओं का अभाव है तथा महिलाओं के विरूद्ध हिंसा मौजूद है । कुछ
ऐसे मामले प्रासंगिक है जिन्होंने ऐसे उदाहरण दिये हैं जिनमे पुरुषों के साथ
ग्रामसभा की बैठकों में महिलाओं ने स्वयं को भयभीत महसूस किया । इतना ही नहीं
स्थानीय निकाय संस्थाओं मे दलगत राजनीति की प्रधानता तथा परिवार के पुरुष सदस्य का
हस्तक्षेप सामान्य बात है ।
क्षमता निर्माण ,महिला सशक्तिकरण
का पहला कदम है । जिसके लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम उपलब्ध कराने की जरूरत है ।
क्षमता वृद्धि कार्यक्रमों के बाद महिला अगुआओं को एक ऐसे सूत्रबद्ध स्थान की
जरूरत होती है जहां वे अपने अनुभवों को साझा कर सके तथा आपस मे सीख सके । क्षमता
और योग्यता का निर्माण रातोंरात नहीं किया जा सकता – यह एक धीमी और सतत प्रक्रिया
है जो महिला प्रतिनिधियों द्वारा सीखी गई बातों का अभ्यास करने का अवसर देकर उनकी
क्षमता को निखार सकता है । महिला केन्द्रित मुद्दों की दिशा में भागीदारी के
निर्माण तथा अगुआ समूहों को कर्तव्यनिष्ठ बनाने और चुनी गई महिला प्रतिनिधियों को
कठिनाइयों के निराकरण के तरीकों के प्रति अभिमुख करने के लिए महिला अगुआओं के
नेटवर्क के माध्यम से एक सशक्त सहायता ढांचा अनिवार्य है ।
पंचायत में
महिला नेताएँ एवं स्थानीय स्वयं सहायता समूह महिलाओं के एक साथ कार्य करने का एक
सशक्त माध्यम है और यह एक सशक्त औज़ार के रूप में कार्य कर सकता है । इसे एक नीति
के रूप में न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि राज्य और उपराज्य स्तरों पर भी समर्थन
देने की जरूरत है । ग्रामीण भारत में महिला नेताएँ अपने पुरुष समकक्षों के मुक़ाबले
बेहतर पेयजल , अवसंरचना , बेहतर साफ सफाई तथा सड़के उपलब्ध करती हैं ।
तथापि कुछ अन्य संस्थाओं की ही तरह पंचायत में महिलाएं पितृसतात्मक एवं सांस्थानिक
कारकों से पैदा होने वाली रुकावटों का लगातार मुक़ाबला कर रही है ।
ध्यान देने वाली
बात है की घूँघट महिला दासता का प्रतीक है जिसमें शादी शुदा महिला को अपने सिर और
चेहरे को किसी वस्त्र से ढंकना पड़ता है जिससे वह गांव के किसी बड़े अथवा अजनबी से
नजरें न मिला सके । इसका जन्म महिला की उसके बात करने के अधिकारों तथा आजादी से
वंचित करने की भावना से हुआ है लेकिन समुदाय आदर के प्रतीक के रूप में इसका समर्थन
करता है । एक तथ्य यह भी है कि महिला एवं पुरुष के बीच समानता की भूमिका पर आधारित
नारीवाद प्रायः लिंग आधारित नीतियों पर आधार रहा है । सबसे जमीनी स्तर पर जहां सूचना
सबसे महत्वपूर्ण है महिलाएं प्रायः सूचना से वंचित हैं । फिर भी वह ज़िम्मेदारी के
साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में लगी हुई है । एक इनोवेटिव नेता होने के
अलावा उनसे एक अच्छी बहू , पत्नी और माँ होने की अपेक्षा की जाती है । तिहरा भार वहन
करने में असमर्थ वे स्वेक्षा से अध्ययन के नए क्षेत्र का निर्माण करती है ।
यद्पि भारत
सरकार के पास संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के साथ मिलकर महिलाओं के लिए अनेक क्षमता
निर्माण कार्यक्रम है लेकिन वे बातचीत में पुरुषों को शायद ही शामिल करते हैं । जब
हम महिलाओं को महत्वपूर्ण भूमिका मे देखना चाहते हैं तो पुरुषों मे समर्थन की अनदेखी
नहीं की जा सकती और जरूरत इस बात की है कि उन्हें अलग – अलग करने के बजाय साथ किया
जाय । महात्मा गांधी ने कहा था , “महिलाओं और पुरुषों की स्थिति एक समान है ,परंतु एक जैसी
नहीं । एक – दूसरे के पूरक वे अद्वितीय युगल हैं , जो एक - दूसरे की
सहायता करते हैं ताकि एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना भी न की जा सके । इन
तथ्यों की तार्किक परिणति यह है कि ऐसी कोई भी वस्तु जो दोनों मे से किसी एक की
स्थिति को कष्ट पहुंचाती है , दोनों को ही समान रूप से नष्ट कर देगी ।“ स्त्री –
सशक्तिकरण वर्तमान दुनिया का बेहद जरूरी विमर्श है । चुकी यह स्त्री की
स्वतन्त्रता , समानता , मजबूती और महता का हिमायती है , इसलिए इसे संपूर्ण मानव
जाति के आधे हिस्से की बेहतरी से जुड़ा विमर्श कहा जा सकता है ।
हमारी
लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सबसे सुदृढ़ भाग राजनीतिक प्रणाली शायद सबसे जमीनी स्तर
पर सुपरिभाषित विकेन्द्रीकृत प्रणाली का सर्वाधिक प्राथमिक कारण है । यद्पि भारतीय
संविधान पंचायती राज संस्थाओं के लिए गैर राजनीतिक स्वरूप का अधिदेश देता है ।
लेकिन वे अनिवार्य रूप से राजनीति आधारित है । चुनाव ,पार्टी लाइनों पर लड़े
जाते हैं । इसका परिणाम यह हुआ है कि पंचायती राज संस्थाएं गांवों कि महसूस कि गई
जरूरतों पर आधारित स्वतंत्र मुद्दा तैयार नहीं कर पाती है । यह उपर से थोपी गई
धारणा , जैसे कि ‘ उनको बता दो ‘ न कि ‘ उनसे पूछो ‘ कि उनकी क्या
जरूरतें हैं ,जैसी है । कोई भी नेता नेतृत्व नहीं कर सकता यदि वह हृदयहीन
है और सामाजिक कार्य सत्ता की सीढ़ी नहीं हो सकता ।
भारत मे एक मौन
लोकतांत्रिक क्रांति हो रही है जो अभी राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से भले ही
दिखाई नहीं दे रही है पर उसकी धीमी आंच भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बना रही है ।
इतना ही नहीं यह क्रांति देश में सत्ता -विमर्श के ढांचे में भी बदलाव ल रही है ।
पंचायत स्तर पर इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने स्थानीय स्तर पर
सामुदायिक जीवन और उसकी चेतना तथा संस्कृति में भी परिवर्तन लाया है । इन
निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में दलित , आदिवासी , पिछड़ी जाति तथा मुस्लिम
महिलाएं भी हैं । इन महिलाओं ने सत्ता के जातीय समीकरण को ही नहीं , बल्कि सामाजिक और
आर्थिक समीकरण को भी बदल दिया है ।
जब संसद और
विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होगा तो महिला पंचायत प्रतिनिधियों के लिए
एक नया राजनीतिक रास्ता खुलेगा और वे उसपर आगे बढ़ते हुए संसद तक पहुंचेगी । उनके
पास एक नया अनुभव होगा जिसका फायदा नीतियों के निर्धारण में मिलेगा । वैचारिक स्तर
पर स्त्री –मुक्ति की नयी लहर स्त्री –सशक्तिकरण की तार्किक परिणति है । इसलिये
इसे वक्त के कैनवस पर स्त्री के भविष्य का स्केच कहा जा सकता है । यह स्केच भारत
सहित पूरी दुनिया में खींचा जा रहा है और यह प्रयास किए जा रहे हैं कि स्त्री
इसमें अपनी इच्छानुसार रंग भर सके ।
यशवंत कुमार ,संपर्क-09868324715
,ई.मेल – yashvant85@gmail.com
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