राष्ट्र निर्माण एक विशेष उपलब्धि है । और यह हरेक के वश की बात नहीं । यह वही कर सकता है जिसमें सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता हो । क्योंकि यह बात भी सही है कि यह अकेले दम पर नहीं किया जा सकता । राष्ट्र निर्माण मे समावेशी विकाश के साथ-२ संवृद्धि की बहुत अहम भूमिका होती है जिसके तहत वर्तमान का बेहतर उपयोग करते हुये भविष्य के लिए इसकी पर्याप्त संभाव्यता को भी बरकरार रखना आवश्यक होता है । आजादी के बाद देश मे शीर्षस्तर पर इसतरह के निर्माणकर्ता का अभाव खलता रहा है । क्योंकि सभी के हित निहित स्वार्थ से फलीभूत होते चले गए हैं । और सही(शुद्ध) परिकल्पना के साथ कुछ करने के लिए अगर कोई आगे आये भी होंगे तो उनके सहयोगी ही (तथाकथित) बाधक सिद्ध हुये हैं । आगे सिर्फ-और-सिर्फ उम्मीद ही लगा सकते हैं कि आने वाले भविष्य में शीर्षस्तर पर देश को एक बेहतर निर्माणकर्ता का नेतृत्व प्रदान हो सके । .......एक उम्मीद के साथ भविष्य की ओर उन्मुख .............. !
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