रविवार, 10 दिसंबर 2017
सर्दी की रात by यशवन्त कुमार
शनिवार, 22 मार्च 2014
राष्ट्र निर्माण
राष्ट्र निर्माण एक विशेष उपलब्धि है । और यह हरेक के वश की बात नहीं । यह वही कर सकता है जिसमें सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता हो । क्योंकि यह बात भी सही है कि यह अकेले दम पर नहीं किया जा सकता । राष्ट्र निर्माण मे समावेशी विकाश के साथ-२ संवृद्धि की बहुत अहम भूमिका होती है जिसके तहत वर्तमान का बेहतर उपयोग करते हुये भविष्य के लिए इसकी पर्याप्त संभाव्यता को भी बरकरार रखना आवश्यक होता है । आजादी के बाद देश मे शीर्षस्तर पर इसतरह के निर्माणकर्ता का अभाव खलता रहा है । क्योंकि सभी के हित निहित स्वार्थ से फलीभूत होते चले गए हैं । और सही(शुद्ध) परिकल्पना के साथ कुछ करने के लिए अगर कोई आगे आये भी होंगे तो उनके सहयोगी ही (तथाकथित) बाधक सिद्ध हुये हैं । आगे सिर्फ-और-सिर्फ उम्मीद ही लगा सकते हैं कि आने वाले भविष्य में शीर्षस्तर पर देश को एक बेहतर निर्माणकर्ता का नेतृत्व प्रदान हो सके । .......एक उम्मीद के साथ भविष्य की ओर उन्मुख .............. !
सकारात्मक राजनीति
सकारात्मक्ता एक महत्वपूर्ण पहलू है जिससे करीब सभी सहमत हो सकते हैं । बस जरूरत है तो इसे आत्मसात करने की । खासकर भारतीय राजनीति के संदर्भ मे देखा जाय तो यह बहुत ही जरूरी है । ध्यान जाता है चुनाव की तरफ जिसमें चुनावी राजनीति सिर्फ-और-सिर्फ सत्ता के लिये ही नहीं होती है बल्कि यह जनता को मुद्दों से अवगत कराते हुये उसे शिक्षित और जागरूक करने मे भी सहायक होती है । जिसके तहत राजनीतिक पार्टियों ,नेताओं ,विभिन्न सामाजिक संगठनों तथा व्यक्तियों के द्वारा इसके विभिन्न पहलुओं और आयामों से देश की जनता को अवगत कराया जाता है । और यदि यह सकारात्मक्ता के साथ हो तो देश के विकास के लिये यह बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकता है ।
रविवार, 17 फ़रवरी 2013
भारतीय समाज का बदलता स्वरूप
आज का भारत बदलाब की
दौर से गुजर रहा है और वह सभी क्षेत्रो मे देखा जा सकता है -प्रशासनिक ,राजनीतिक ,आर्थिक और सामाजिक । सांस्कृतिक क्षेत्र को भी नजरंदाज
नहीं किया जा सकता । आज से 65 साल पहले भारत मे जो सपना बुना गया था वह इन 65 वर्षो मे बहुत ही कठिनाई भरा रहा है और अब उसकी तरफ
पहल होना शुरू हुआ है ,जिसमे वर्तमान समाज की जागरूकता और उसके द्वारा किया गया पहल से यह संभव हो
प रहा है । आज भारत मे नागरिक समाज जागरूक व मुखर हो रहा है और सरकार को उसके फैसलो
के लिए जवाबदेह बना रहा है । आम लोग सरकार के साथ वार्ता और फैसलो मे भागीदारी चाहते
हैं । वे नीति निर्माण में पारदर्शिता छाते हैं । आज का युवा चाहता है कि देश के राजनेता संविधान द्वारा निर्मित संस्थानो
के अनुरूप चलें ,उनका उलंघन न करें । वह सुशासन
के लिए नये नैतिक ढांचे का निर्माण करना चाहता है । अब लोग मुख्यधारा में आ रहे हैं
और अपनी आवाज़ उठा रहे है । प्रशासनिक सहयोग भी मिल प रहा है । पारंपरिक परिभाषा के
अनुसार वह बंधे - बँधाए ढर्रे पर नहीं चल रहा है और फैसले लेते समय वह अपनी समझ -बूझ का भी इस्तेमाल कर रहा है । सरकार मे सुशासन
का मतलब है अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनहित मे फैसले लेना । वर्तमान समय
मे शासन शब्द इतना व्यापक हो गया है कि यह केवल सरकार तक सीमित नहीं रह गया है । शासन
अब कार्यपालिका ,विधायिका और न्यायपालिका से
विस्तारित होकर सिविल सोसाइटी ,सामाजिक संगठन ,मीडिया और जनता तक फैल गया है । ये तमाम अंग पहले से कहीं अधिक जोरदारी से आवाज़
उठा रहे है और सरकार से बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा रखते हैं । राजनीतिक स्तर पर अभी
भी कमजोरियाँ है ,किन्तु उसमे भी सुधार के प्रयास
हो रहे हैं । जनता बढ़ -चढ़कर भाग ले रही है ,वह सक्रिय तौर पर अपना आवाज़ बुलंद कर रही है । मतदान भी अधिक संख्या मे हो रहे
है । यह संकेत है कि लोकतंत्र मे 'मनमानी' को बर्दास्त नहीं किया जाएगा । आर्थिक क्षेत्र में 90बे के बाद के दशक से लगातार सुधार की प्रवृति देखने
को मिल रही है । आर्थिक उदारीकरण का दौर जारी है । भारतीय समाज अर्थतंत्र को मजबूती
देने के लिए उद्योग -धंधो के विकास में अपना योगदान
दे रहे हैं । नवाचार की प्रवृति बढ़ी है । घरेलू -उद्योग से लेकर वृहत -उद्योग तक तंत्र का विकास हो रहा है । समाज मे असमानता
की 'खाई' अभी भी विद्यमान है ,किंतू इसे भी दूर करने के निरंतर प्रयास हो रहे हैं
। भारत को 'विभिन्न संस्कृतियों व धर्मों' का देश कहा जाता है । यहाँ
की सांस्कृतिक विविधता संसार के देशों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है । 'सर्वधमसमभाव ' हमेशा से विद्यमान रहा है
। भारतीय समाज अपने पुर्खों की इस परंपरा को आत्मसात किए हुए हैं तथा पुर्खों की विरासत
को संजो कर रखे हुए हैं । आज की युवा पीढ़ी बदल जरूर रही है , किंतू जब सांस्कृतिकता की
बात आती है तो वह इसे प्रसतूत करने में कोई 'कसर' नहीं छोड़ते । भारतीय समाज का बदलता हुआ यह स्वरूप
परिचायक है कि जिस भारत के निर्माण का हमारे पुर्खों ने सपना देखा था वह शायद 'साकार' हो जाय ।
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